Sunday, 21 August 2011

कानून बनाने का एकाधिकार.......

अभी हाल ही में हमारे जननेताओ को ये याद आ गया है की कानून बनाने का या उसे पारित करने का हक सिर्फ हमारे देश की संसद को है न कि किसी 'Civil Society' को, मगर क्या कभी उन्होंने ये सोचने कि कोशिस कि आखिर ऐसी क्या नौबत आ गयी जो इस देश की जनता को कानून बनाने के लिए हमारे देश की सरकार पे या माननीय जननेताओ पे दबाब बनाना पड़ रहा है ?

इस सवाल का जबाब हम सभी जानते हैं की जब हमारी त्रस्त जनता ने इन्हें 64 साल का लम्बा वक़्त दिया एक ऐसा कानून बनाने के लिए जो की यहाँ की आवाम को  भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला सके | तो इस पूरे समय अंतराल के दौरान तो ज्यादातर नेता  भ्रष्टाचार को बढावा देने में लगे रहे और कुछ दो-चार नेताओ ने अगर ईमानदार कोशिस भी की एक मजबूत लोकपाल कानून बनाने की तो इन्ही नेताओ ने वो बिल पास नहीं होने दिया, इसी वजह से तो आज तक इस देश में एक ससक्त लोकपाल कानून पारित ही नहीं हो पाया जबकि इसको कानून बनाने की 9 बार पहले भी कोशिस हो चुकी है |

और अब अगर जनता खड़ी हुई है इस काम के लिए तो अब ये उस काम पे अपना एकाधिकार जताने में लगे हुए हैं ताकि किसी भी तरह से ये कानून न बन पाए क्यूंकि यदि ये विधेयक पारित हो गया तो इसके मज़बूत सिकंजे को उनके पापी हलक तक पहुचने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा | इसीलिए ये नेता चाहते हैं की विधेयक पारित करने का अधिकार सिर्फ इनके पास ही सुरक्षित रहे और यदि ऐसा ही हुआ तो ये कभी उस विधेयक को किसी न किसी कारण से लटकाए ही रहेंगे |



जय हिंद
जय भारत 

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