Thursday, 18 August 2011

संविधान और जनलोकपाल .......

जब भी मैं कपिल सिब्बल या किसी और कांग्रेस, भा.ज.पा., या अन्य किसी भी राजनैतिक दल के नेताओ को ये बोलते सुनता हूँ की अन्ना जी द्वारा सुझाया हुआ जनलोकपाल बिल अगर पारित कर दिया गया और कानून बना दिया गया तो संवैधानिक संकट खड़ा हो जायेगा|

तब मैं उन लोगों से ये ज़रूर जानना चाहूँगा की हमारे देश का संविधान हमारे देश के लिए है या हमारा देश हमारे संविधान के लिए | क्यूंकि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र यहाँ के लोगों की वजह से है और अब अगर यहाँ के लोग ही ये चाहते हैं की समाज से भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए व्यवस्था में कुछ मुलभुत परिवर्तन लाकर इस देश के लोकतंत्र को सफकता के नए आयाम तक ले जाया जाये तो इसमें क्या गलत है?

और जहाँ तक मैंने लोकतंत्र को समझा है यह वह राजनैतिक व्यवस्था है जिसमे सत्ता का केंद्र वहां की जनता के हाथ में होता है और जैसा जनता की भलाई के लिए होना चाहिए वैसा होता है| मगर आज इस एक जन लोकपाल कानून के खिलाफ सरकार के रवैये की वजह से मुझे अपने देश में लोकतंत्र ख़त्म होता दिखाई दे रहा है| सत्ता पक्ष इस तरह का व्यव्हार कर रही है जैसा की देश 25 जून 1975 – 21 मार्च 1977 के दौरान श्रीमती इन्द्रा गाँधी जी के कार्यकाल के दौरान झेल चुका है, उस दौरान भी देश को आपातकाल से कुछ अच्छा हासिल नहीं हुआ था बल्कि समूचे विश्व में हमारी बदनामी हुई थी|

मैं आज की सत्ता धारक प्रजातान्त्रिक सरकार से अनुरोध करता हूँ की वह जनता की बात सुने और उसके अनुसार कोई उपयुक्त उपाय निकल के जनता की शिकायतों का समाधान करें.....

जय हिंद
जय भारत||

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