हम सभी भगवान् परशुराम की जयंती के दिन उन्हें बड़े ही आदर और भक्तिभाव से स्मरण करते हैं तथा अक्षय तृतीय के दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं | किन्तु क्या कभी हम में से किसी ने भगवान् परशुराम की सच्ची भक्ति की है? क्या कभी उनके जीवन के उधारनो को अपने जीवन के आदर्श मानकर अपनी दिनचर्या में उनका अनुशरण किया है? हम में से शायद विरले ही होंगे जिन्होंने कभी इस बात पर विचार भी किया होगा, की भगवान् परशुराम के सम्पूर्ण जीवन से हम वर्तमान युग के सन्दर्भ में क्या सीख ले सकते हैं? आज के इस भौतिकवादी युग में जहाँ न-न प्रकार की विसंगतियां व्याप्त हैं, वहां हम किस प्रकार प्रभु के द्वारा स्थापित आदर्शो से समाज में शांति कायम कर सकते हैं |
हमने हमेशा भगवान् परशुराम के क्रोध के बारे में ही पढ़ा या सुना है किन्तु यदि हम अपना सम्पूर्ण ध्यान उनके जीवन पर केन्द्रित करके उसका अध्ययन करें तो हमें अनेको ऐसे वक्तव्यों का ज्ञान होगा जहाँ प्राय: हम उनके क्रोध या प्रतिशोध के बारे में पढ़ते या सुनते थे , वहीँ हमे उन्ही परिस्थितियों के दूसरे पहलु के बारे में ज्ञान होता है |
मैं आप सब के लिए ऐसा ही एक उद्धरण प्रस्तुत करता हूँ:-
जब कर्तावीर्यर्जुना के पुत्रो ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी और भगवान् परशुराम ने अपनी माता को अपने पिता के पार्थिव शरीर के पास विलाप करते देखा तो उन्होंने अपनी ब्राहमण जाती की सीमओं को लांघकर क्षत्रिय वेशभूषा धारण की और परिस्थिति के अनकूल अपना आचरण रखते हुए उन्होंने क्षत्रियों का दमन किया |
यहाँ इस उद्धरण में मैं यह नहीं दर्शाना चाहता हूँ की उन्होंने किस प्रकार प्रतिशोध की अग्नि में जलकर दुष्टों का संघार किया बल्कि मैं तो यह दिखाना चाहता हूँ की जब हमारे ईस्ट ही इन जातिगत सीमाओं को न मानकर परिस्थिति के अनकूल आचरण रखने के हिमायती हैं, तब हम लोग क्यों आज भी जातिगत भेदभाव में लिप्त हैं?
'अश्वात्थामो बलीर व्यासः हनुमंस्चा विभिशानाह कृपः परशुरामास्चा सप्तैते चिरजीविनः'
मैं यह नहीं जनता की इस श्लोक मैं कितनी सचाई हैं मगर हम सब मिलकर इनको अपने मन में अवस्य चिरंजीवी बना सकते हैं |
हमने हमेशा भगवान् परशुराम के क्रोध के बारे में ही पढ़ा या सुना है किन्तु यदि हम अपना सम्पूर्ण ध्यान उनके जीवन पर केन्द्रित करके उसका अध्ययन करें तो हमें अनेको ऐसे वक्तव्यों का ज्ञान होगा जहाँ प्राय: हम उनके क्रोध या प्रतिशोध के बारे में पढ़ते या सुनते थे , वहीँ हमे उन्ही परिस्थितियों के दूसरे पहलु के बारे में ज्ञान होता है |
मैं आप सब के लिए ऐसा ही एक उद्धरण प्रस्तुत करता हूँ:-
जब कर्तावीर्यर्जुना के पुत्रो ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी और भगवान् परशुराम ने अपनी माता को अपने पिता के पार्थिव शरीर के पास विलाप करते देखा तो उन्होंने अपनी ब्राहमण जाती की सीमओं को लांघकर क्षत्रिय वेशभूषा धारण की और परिस्थिति के अनकूल अपना आचरण रखते हुए उन्होंने क्षत्रियों का दमन किया |
यहाँ इस उद्धरण में मैं यह नहीं दर्शाना चाहता हूँ की उन्होंने किस प्रकार प्रतिशोध की अग्नि में जलकर दुष्टों का संघार किया बल्कि मैं तो यह दिखाना चाहता हूँ की जब हमारे ईस्ट ही इन जातिगत सीमाओं को न मानकर परिस्थिति के अनकूल आचरण रखने के हिमायती हैं, तब हम लोग क्यों आज भी जातिगत भेदभाव में लिप्त हैं?
'अश्वात्थामो बलीर व्यासः हनुमंस्चा विभिशानाह कृपः परशुरामास्चा सप्तैते चिरजीविनः'
मैं यह नहीं जनता की इस श्लोक मैं कितनी सचाई हैं मगर हम सब मिलकर इनको अपने मन में अवस्य चिरंजीवी बना सकते हैं |
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